आपका सवालः असलामअलैकुम सिराज भाई.. सिराज भाईः मेरा सवाल है क्या रमज़ान में पुरी रात जागना और सहर के बाद ग्यारह-बारहा बजे तक सोना कैसा अमल है…

जवाबः

सवाल बहत मुब्हम है… यानी इस सवाल के बहत से मआना निकल सकते हैं..

सवाल तनक़ीदी और तआरुफ़ी भी नज़र आरहा है..

मैं सबसे पहेले तआरुफ़ी तौर पर जवाब देता हूं..

अगर कोई शख़्स रात भर ईबादत करता और सुब्ह सहरी करता और फ़ज्र की नमाज़ पढ़कर गयाराह-बारहा बजे तक या ज़ोहर तक सोजाए तो इसमें कोई हर्ज नहीं…इससे ना ही रोज़ा मकरुह होता है और ना ही रोज़ा टूटता है…

अब इस सवाल को तन्क़ीदी नज़र से दिखाते हैं..

अगर कोई शख़्स रात तमाम जागे और जगाने की कोई ख़ास वज्ह ना हो और फिर सहर करे फार फ़ज्र पढ़े और सोजाए इस लियेके इसी बहाने आधा रोज़ा ही कट जाएगा…सिर्फ़ आधा रोज़ा को वक़्त से गुज़ारना होगा.. तो ऐसा करना ग़लत होगा.

अब  आइए….

आपके अस्ल सवाल का जवाब देता हूं…

अगर रोज़ादार फ़ज्र से लेकर ज़ोहर तक सोया हुआ रहे तो इसमें कोई हर्ज नहीं और न ही वह गुन्हेगार होगा.. और न ही उसका रोज़ा मकरुह होगा… मगर इसकी आदत बनालेना अच्छी बात नही… रमज़ान का महिना साल में हर मर्तबा आता है और कोई इस महा में अपनी मग़फिरत न करवालेता हो तो ऐसा शख़्स बहत बड़ा महरुम शख़्क कहेलाएगा/ होगा.