सवालः क्या सुफ़िइज़म् का ईसलाम में कोई कंसेप्ट है.क़ुरआन व हदीस की रौश्नी में वज़ाहत से बताईऐ.

आसक्ड बाय मोहम्मद जाविद,परभणी-महाराष्ट्र.

आसक्ड ऑन-22-10-2014- 10:43 एएम.

आसक्ड ईन-फ़हमुल् क़ुरआन-4,ग्रुप.

जवाबः

येह उन्वान काफ़ी तवील है, लेकिन में कोशिश करुंगा के इस को मुख़तसर लिख सकूं.

सुफ़िइज़म् या सुफ़ियात को तसव्वुफ़़ भी कहेते हैं.

अगर ईसलाम मुसलमान के तर्ज़े अमल से है तो यक़िन्न सुफ़िइज़म् का तसव्वुर ईसलाम में है और अगर ईसलाम नाम है अल्लाह और ईसके रसूल सल्लाअल्लाहु अलैहि व सल्लम् की ईतआतसे तो क़स्म- अल्लाह-सुफ़िइज़म् (यानी सोफ़ियात का ईसलाम में कोई तसव्वुर नहीं.

सुफ़ियात एक ऐसा उन्वान है जिसमें मुदाख़िलत करना-को छेडना (यानीके 90 फ़िसदीसे ज़ियादा मुसलमानों से दुश्मनी लेना है.

सुफ़ियात का असर  हर आम और ख़ास पर होता है.सुफ़ियात का तआलूक़ जहाँ बराएरास्त अक़ीदा से है तो वहीं इस का तालुक़ बराए रास्त शरिअत् ईसलामीके अमलसे भी है.

मुसलमानों की इस सुफ़ियात की तारिख़ को बताते हूऐ ये कहना कुच्छ ग़लत नहीं होगा के सुफ़ियात मुसलमानों के लिए एक शजरए मम्नुआ की हैसियत रखता है यानी के एक ऐसा दरख़्त जिससे बचने की हर आम और ख़ास को सख़्त ज़रुरत है. जैसाके उस के क़रीब जाते ही तक़्वा व परहेज़गारी का लिबास उतर जाता है, अक़्ल व फ़हेम् सब जाती रहेती है. क़ुरआन और सहीह अहादीसके ईल्म् से नाबलद् और ना आशना होता जाता है.

अब आप सोच रहे होंगे के यह बात मैं कैसे कहे रहा हूँ ?

लोग कहेते हैं ईसलाम में जब किसी की पीएचडी होजाती है तो वह सुफ़ी बन जाता है,तो फिर हमने एक क़द्म् आगे बड़हते हूए सुफ़ियात परही पीएचडी कर डाली और इसीकी बुन्याद् पर हमने यह नतिजा भी निकाला.

सुफ़ियात के क्या माना हैं और यह लफ़्ज़ कैसे बना है इसकी बिल्कुल ज़रुरत नहीं है क्यों अगर इसकी ईबतेदा और बुन्याद बुराई पर हूई थी तो यक़िन्न इसके समरात भी बुरेही निकलेंगे और इसकी ईबतेदा और बुन्याद अच्छाई पर हुई तो फ़िर इसके समरात और नताएज इतने बुरे क्यों हैं ?सुफ़ियात मुसलमान के लिए सबसे ज़ियादा नुक़सानदेह इस लिए है क्यों कि यह अक़ीदेके बिगड जानेसे सबसे बड़ा और अस्ल सब्ब् है और ईसलाम में अक़ीदा की बड़ी अहमीयत है.सहीह अक़ीदाही मुसलमान को जन्नतमें लेजाऐगा और नेक और सालेह आमाल अक़ीदेके ताबे होते हैं और यही वह सुफ़ियात हैं जिसके फ़ैज़से हर ज़मानेमें सारे मज़ाहेब,सारे धर्म,अदीयान और गुमराह फ़िरक़े मुस्तफ़ैज़ हुऐ और पनपते रहें.

सुफ़ियाना ईफ़क़ार दुनिया का कोई भी कुफ्ऱ जिंदीक़ाना अक़ीदा और मुल्हेदाना अक़ीदा ऐसा नहीं जो सुफ़ियाना ईफ़कार में दाख़िल होकर सुफ़ी अक़ीदाका जुज़्व – हिस्सा ना बन गया हो.

सुफ़ियात की बुन्याद चंद बुन्यादी अक़ाएद पर है जिनमें से एक है वहीदत व लावजुद का अक़ीदा.

इस अक़ीदेसे यह साबित किया जाता है के काएनात में जो कुच्छ मौजुद है वह सब अल्लाह ही का है.(अस्तग़फिरउल्लाह)

गोयाके इस अक़ीदासे हर चिज़में अल्लाहके होनेका दावा किया जाता है और इसी घिनाओने अक़ीदाको-अल्लाह माफ़ फ़र्माए.

बाज़ उलमाए ईकराम की भरी मजलीसमें इसका ईक़रार किया है और कहाके हिंदोओंकी मुरतीयोंमें भी ख़ुदा मौजुद है,और अगर यही अक़ीदा एक हिंदू रखता है तो वह काफ़िर कैसे हुआ?

एक हिंदू कहेता है के हर कंकर में शंकर है तो उसका ये कहेना कैसे ग़लत हुआ.

अगर हिंदू हर कंकर को शंकर कहेकर इस की पुजा और उपासना करता है तो वह काफ़िर कैसे हुआ?

जबके उन्हें सुफ़ियाना अक़ीदाके मुताबिक़ ही तो हर चीज़में अल्लाह मौजुद है.

ईल्म हुआ तो कियों ना हर चीज़की ईबादत की जाए?(अस्तग़फ़िरउल्लाह-नउज़ुबिल्लाह).

इस ज़िम्न में क़ुरआन मजीद क्या दर्स देता है दिखाते हैं.

अल्लाह तबारक् व तआला कहां कहां मौजुद हैं.

इस तालुक़ से अल्लाह तआलाने फ़र्माया:

(अरबिक………………  )

तर्जुमाः

अलरहेमान-अल्लाह तआला अर्श पर मुस्तवी है.सुरतुल् ताहा-( सुरतुल् ताहा -20-5)

यही बात अल्लाह तबारक् तआलाने क़ुरआन मजीदमें दुसरे मुक़ामात पर भी फ़र्माया:

जैसेः सुरतुल् ऐराफ़ (7-54),सुरतुल् युनुस(10-3), सुराहतुल् हुद्(13-2),सुरतुल् फ़ुरक़ान(25-59), सुरतुल् सजदा(32-4),सुरतुल् हदीद-57).

अब यहां एक शक्ल-सुरत है (यानीके सवाल यह पैदा होता है कि क़ुरआन मजीदमें तो यह भी मौजुद हैके अल्लाह तबारक् व तआला पुरी काएनातमें हमारे साथ (हर जगह)मौजुद है.

इस फ़हम् को इस तरह दूर किजिऐ-बेशक अल्लाह हमारे साथ है. लेकिन ईल्मी एतेबार से अल्लाह अपनी ज़ातसे अर्श पर मुस्तवी है.( सुरतुल् ताहा -20-5)

यही बात अल्लाह तबारक् व तआलाने क़ुरआन मजीद में दुसरे मुक़ाम पर भी फ़रमाऐ.

जैसेः सुरतुल् अऐराफ़-7-54,सुरतुल् युनुस 10-3, सुरतुल् हुद्…..13-2, सुरतुल् फ़ुरक़ान 25-59,सुरतुल् सजदा-32-4,सुरतुल् हदीद-57)

अब यहां एक शक्ल-सुरत है यानीके सवाल पैदा होता हैके क़ुर्आन मजीदमें तो यह भी मौजूद हैके अल्लाह तबारक् व तआला पुरी काऐनात में- हमारे साथ है.

इस फ़हम् को इस तरह दूर किजिऐ- बेशक अल्लाह हमारे साथ है, लेकिन ईल्मी ऐतेबार से और अल्लाह तबारक् तआला अपनी ज़ातसे अर्श पर मुस्तवी है.

इनका एक और अक़ीदा है हौलूल…. का अक़ीदा.

ईस अक़ीदा की बुन्याद पर बाज़ सुफ़ियों को अफज़ल तरीन मवाहीद कहेते हैं क्योंके ईसने क़र्आनमें यह दावा कियाके अना रब्ब-बक़ौल-यानी मैं ही तुम्हारा सब्से बड़ा रब्ब् हूँ.(सुरतुल् नाज़-आयत-79-24).

सुफ़ियात केहेते हैं फ़िरक़ाऐ दाऊदी की वजह येह हैके ईसने हक़ीकत को पहेछान लिया था और अल्लाह की ज़ात ईसमें समां गई. ईस लिऐ येह फ़िर्क़ा भी जन्नती है.

ईनका एक और बुन्यादी अक़ीदा यह हैके शरीअत् एक अलग और तरीक़त एक अलग चीज़ है.यह दोनों आपसमें कभी नहीं मिलते. दोनों मुत्ज़ाद,अपोज़िट है, मगर फिर भी दोनों सिधे जन्नतमें ले जाते हैं या ईसके अलावा ईनका ये कहेना हैके सिर्फ शरीअत ईन्सान को जन्नतमें नहीं ले जाती. तरीक़त के बग़ैर-शरीअत् बेकार,नामुकमल है.(असतग़फ़िरुल्लाह).

शरीयअत् अल्लाह की तरफ़से नाज़िल हूई है और तरीक़त ईन सोफ़ी हज़रात की….

इस तालुक़से अल्लाह तआला फ़रमाता है.

(अरबी……………………………..

तर्जुमाः

हक़्क यानीके शरीयअत्-तुम्हारे रब्ब् की तरफ़से है. लेहाज़ा कभी शक करने वालो में ना शामील होना.

सुरतुल् बक़रा-147-2, सुरतुल्आल-ईमरान 3-60,सुरतुल्अम्म-114-6 और सुरतुल् युनुस-10-94).

इन सुफ़ीयों की तरीक़तमे नमाज़े, रोज़ाके मुतालीक़से यानीके यह लोग ईस तरह नमाज़ नहीं पढ़ते जिस तरह अल्लाहके रसुल  सल्लाअल्लाहु अलैहि व सल्लम् ने फ़र्माए है बल्के इनका नमाज़ का तरीक़ा अलग है, ईनकी नमाज़ दिलमें होती है. फ़ज्र ईरानमें तो ज़ोहर ईराक़ में फिर असर मदीनमें और ख़ानाए काबामें और ईशा वहां पर जहां ईनका दिल चाहता है यानी के दुनियां में या दुनियां के बाहेर या कभी कभी सिधे अर्शपर ही ईनकी नमाज़ होती है और यही ईनका रोज़ाना का माअमोल-डेली रोटीन है.

सोफ़ीयोंमें सारे पागल,मआज़ुब,लौंडीबाज़, हमजिन्स् के ख़ुगर और आदी बल्के सारे आम… बदफ़ेली करनेवाले होते हैं.(असतग़फ़रुल्लाह)

आप लोगों को सोफ़ीयोंके ऐसे भी वाक़ेआत सुन्ने या पढने मिलेगे जिसमें ज़िंदगीभर एक सोफ़ी,जो…सल… नहीं करता,ज़िंदगीभर बरहना-नंगा-रहेता है और ईसी हालमें… ख़ुतबा…भी देता है.

इनके नज़दीक सल्लाहवअलैहीवसलअम- ही ख़ुदा और ख़ुदाही-मोहमद सल्लाहवअलैहीवसल्लम हैं.

जैसे के सोफ़ीयोंके ईस शअरसे माअलुम होतो है.

वही अर्श पर जो था मुस्तवी बनकर

ऊतर पड़ा है मदीनामें मुसतुफ़ा बनकर

इसलाम और तस्वूफ़में फ़रक़ः             

इसलामके ईल्म की बुन्याद अंबीयां और पैग़ंबरान की वहीपर है गोयाके ईसलामके इल्म का मग़्ज़… और सोरस्- अल्लाह और रसुल होते हैं.

मगर सिफ़ात के इल्म की बुन्याद और इन का मग़्ज़…. और सोर्स-खयाले वही-शैतानी वसवसे-मजमआ काशिफ़ और ईल्म ग़ैब के हुसूल के दाअवे पर है.

यह कभी ख़ुद अल्लाह बन जाते हैं तो कभी अल्लाह से बराए रास्त क्लाम करते हैं. यह कभी रसुलों…. को पीच्छे छोड़ देते हैं तो कभी बराए रास्त्-रसुल-सल्लाह अलहे वसल्लम-से मुलाक़ात करके इन से इल्म हासील करलेते हैं.

ईसलाम के मुताबिक़ काएनात इन के तस्ऊफ  करने वाली ज़ात-अल्लाह की है.

और इन सोफ़ियों के मुताबिक़ काएनात इन के तस्ऊफ से चलती है.

सोफ़ियाना ईफ़कार के नुक़सानातः

मुसलमानों का क़र्आन-हदीस से दूर होना.

क़ुरआन और हदीस के मआने व मतलब को बदला जाना.

ईस्लामी अक़ीदा की बरबादी होना.

फ़स्क़ व फ़जूर और फ़हाश व बुराई का इस उम्मत में फैल जाना.

मोसिक़ी-म्यूझिक इन के नज़दीक जाएज़-हलाल होना, इसका सुनाना और इस पर रक़्स करना यानीके (रख़्स)नाचना वगैरे. यह सब इनकी ईबादत में शामिल होता है.

हमारी उपर की तफ़सील से कोई येह ना समझे के हम ने सिर्फ़ मज़मूम और गल्त् सोफ़ियात की तरदीद की है बल्के हम ने हर क़िस्म के सोफ़ियात की तरदीद की.

येह बात इस लिए ब्यान करनी पढ रही है कियोंके बाज़ लोगों की यह भी ग़ल्त् फ़हीमी हैके सोफ़ीयात में भी अलग अलग दरजात हैं और इन सोफ़ीयात में एक दर्जा और सहीह सोफ़ीयात भी हैं जिस से तज़कीया नफ़्स का काम लिया जाता है.

सोफ़ीयात और इस की गुम्राही से बचने के लिए हम वही ऊसूल लेते हैं जो अल्लाह के नबी सल्लाहअलहीवसल्लम ने बिद्आत के तआलुक़ से ब्यान किया है. कुल्ल बिद्आत …. हर क़िस्म की बिद्आत गुमराही है तो इस तरह हर क़िस्म की सोफ़ीयात भी गुमराही है.

सोफ़ीयात पर कोई 100 फ़िसद है.

बहरेकैफ़- वल्लाह-इस पर अमल या किसी भी क़िस्म का इस का असर मुसलमानों को गुमराही से नहीं बचा सकता. अल्लाह हम सब को इस घिनावनी और गंद्दी गुमराही से बचाय और अपने सिधे और सच्चे रास्ते की रहनुमाई की तोफ़ीक़ अताअ फ़रमाए.अमीन यारब्बीलआलमीन-