असलाम अलैकुम (रहे.व बरकातहू) सिराज भाई-मेरा सवाल है, मैंने किसी से सुना हूँ-नाबालीग़ पर और मुसाफ़िर पर जुमुआ फ़र्ज़ नहीं है। किया ये दुरुस्त है.

आसक्ड बाय: अरबाज़ हश्मती(घाशपुरा,खंडवा-एम.पी)

आसक्ड ऑनः11-2014-11:09-एम आसक्ड ईन

फ़हमुल् क़ुरआन-6,ग्रुप ऍण्ड पर्सनल.

जवाबः

जी हाँ- भाई- यह दुरुस्त है.

भले ही आपने सिर्फ़  सुना है और इस की कोई दलील आप को मालुम ना हो या फिर जिसने भी यह बात आप को बताई है इन को भी शायद इस की दलील मालुम ना हो,मगर यह बात तो सही-दुरुस्त है.

मैं यह बात इस लिऐ बयान कररहा हूँ कियों कि ईल्म नाम है दलील के जान लेनेका वरना हर सुनी -सुनाई हुई बात सहीह हो यह ज़रुरी नहीं.

आपके सवाल के मुताबिक़ दो लोग जुमुआ की फ़रज़ियत से मुस्तस्ना हैं.

नाबालिग़ लडका,मुसाफ़िर-इन दोनों का ज़िक्र दो अलग अलग अहादीस में आया है.

इस की पहिली हदीस यह है.

(अरबी…………………………….

तर्जुमाः

तारेक़ बिन शहीब रज़ी अल्लाह तआला अन्ह कहेते हैं.

नबी सल्लाअल्लाहु अलैहि व सल्लम् ने फ़रमायाः

जमात की शक्ल में जुमुआ की नमाज़ हर मुसलमान पर वाजीब – फ़र्ज़ हक़ है(यानी जुमुआ फ़र्ज है) लेकिन चार क़िस्म के लोग इस से मुस्तस्ना (यानी इन पर जुमुआ फ़र्ज नहीं है.)

ग़ुलाम,औरत,नाबालीग़ लड़का,मरिज़(सुन्न अबु दाऊदः1067)

इस दलील को मुकमल जान लेने के बाद हमारे ईल्म में तीन क़िस्म के लोगों का ईज़ाफ़ा हुआ.

ग़ुलाम औरत,नाबालिग़ लडका,मरिज़

दुसरी दलील यह है.

(अरबी………………………..

तर्जुमाः

ईब्ने उमर रज़ी अल्लाह तआला अन्ह से रिवायत है.

नबी सल्लाअल्लाहु अलैहि व सल्लम् ने फ़रमायाः

मुसाफ़िर पर जुमुआ(फ़र्ज) नहीं.

(अलमोज्जब अवसत अलतीबरानी-818) यह पाँच क़िस्म के लोग अगर चाहे तो जुमुआ की नमाज़ अदा करें या फ़िर सिर्फ़ ज़ोहर की नमाज़ अदा करें दोनों तरीक़ों से दुरुस्त है.